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Dec 16, 2013

नज़र आती नहीं मंजिल और मेरे महबूब ...


चंद्रानी मुख़र्जी के बारे में पढ़ते हुए उनके गीतों को सुना ..कई साल बाद फिर से उनकी आवाज़  मे मधुर गीतों को सुनकर खुद भी गुनगुनाने का दिल हुआ और उनके गाये दो बहुत ही लोकप्रिय गीत मैं यहाँ पोस्ट कर रही हूँ ये दोनों बिना संगीत हैं..


केवल स्वर

१-मेरे महबूब शायद आज कुछ .....
फिल्म-कितनी दूर कितनी पास [१९७६]
गीत और संगीत -रविन्द्र जैन
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२- नज़र आती नहीं मंजिल
फिल्म -कांच और हीरा [१९७२]
गीत और संगीत -रविन्द्र जैन

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4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (17-12-13) को मंगलवारीय चर्चा मंच --१४६४ --मीरा के प्रभु गिरधर नागर में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर गीत। सुबह -सुबह सुना अभी। अच्छा लगा । :)

Rajeev Kumar Jha said...

बहुत सुंदर अल्पना जी.आपकी आवाज में इस गीत को सुनना बहुत अच्छा लगा.

Ramakant Singh said...

मधुर और केवल मधुर